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Showing posts from August, 2020

जैसी करनी वैसी भरनी

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जैसी करनी वैसा फल, आज नहीं तो मिलेगा कल ! 〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️〰️ अच्छे इन्सान बनो और सबका भला करो पीछे जो हुआ उसे सुधार लो और आगे का भी ध्यान रखो। हमारा एक खोटा कर्म ना जाने हमारे कितने जन्म लेने का कारण बन सकता है ! एक गाँव के एक जमींदार ठाकुर बहुत वर्षों से बीमार थे। इलाज करवाते हुए कोई डॉक्टर कोई वैद्य नहीं छोड़ा कोई टोने टोटके करने वाला नहीं छोड़ा। लेकिन कहीं से भी थोड़ा सा भी आराम नहीं आया ! एक संत जी गाँव में आये उनके दर्शन करने वो ज़मींदार भी वहाँ गया और उन्हें प्रणाम किया उसने बहुत दुखी मन से कहा - महात्मा जी मैं इस गाँव का जमींदार हूँ का सैंकड़ों बीघे जमीन है इतना सब कुछ होने के बावजूद मुझे एक लाइलाज रोग है जो कहीं से भी ठीक नहीं हो रहा ! महात्मा जी ने पूछा भाई, क्या रोग है आपको जी मुझे मल त्याग करते समय बहुत खून आता है और इतनी जलन होती है जो बर्दाश्त नहीं होती। ऐसा लगता है मेरे प्राण ही निकल जायेंगे। आप कुछ मेहरबानी करो महात्मा जी बाबा ने आँख बंद कर ली शांत बैठ गये थोड़ी देर बाद बोले -बुरा तो नहीं मानोगे एक बात पूछूँ ? नहीं महाराज पूछिये ! तुमने कभी किसी का दिल इत...

एक कटोरी दही की कीमत

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जब एक शख्स लगभग पैंतालीस वर्ष के थे तब उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। लोगों ने दूसरी शादी की सलाह दी परन्तु उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि पुत्र के रूप में पत्नी की दी हुई भेंट मेरे पास हैं, इसी के साथ पूरी जिन्दगी अच्छे से कट जाएगी। पुत्र जब वयस्क हुआ तो पूरा कारोबार पुत्र के हवाले कर दिया। स्वयं कभी अपने तो कभी दोस्तों के आॅफिस में बैठकर समय व्यतीत करने लगे। पुत्र की शादी के बाद वह ओर अधिक निश्चित हो गये। पूरा घर बहू को सुपुर्द कर दिया। पुत्र की शादी के लगभग एक वर्ष बाद दोहपर में खाना खा रहे थे, पुत्र भी लंच करने ऑफिस से आ गया था और हाथ–मुँह धोकर खाना खाने की तैयारी कर रहा था। उसने सुना कि पिता जी ने बहू से खाने के साथ दही माँगा और बहू ने जवाब दिया कि आज घर में दही  नहीं है। खाना खाकर पिताजी ऑफिस चले गये। थोडी देर बाद पुत्र अपनी पत्नी के साथ खाना खाने बैठा। खाने में प्याला भरा हुआ दही भी था। पुत्र ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और खाना खाकर स्वयं भी ऑफिस चला गया। कुछ दिन बाद पुत्र ने अपने पिताजी से कहा- ‘‘पापा आज आपको कोर्ट चलना है, आज आपका विवाह होने जा रहा है।’’ पिता ने...

एक गर्भवती हिरनी की मार्मिक कहानी

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* एक गर्भवती हिरनी की मार्मिक कहानी * जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थीl  वो एकांत जगह की तलाश में घूम रही थी, तभी उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिएl वहां पहुँचते  ही उसे प्रसाव पीड़ा शुरू हो गई, उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे और बिजली कड़कने लगी। उसने दाएं देखा तो एक शिकारी तीर का निशाना उस की तरफ साध रहा था, घबराकर वह दाहिने मुड़ी तो वहां एक भूखा शेर झपटने को तैयार बैठा थाl सामने सूखी घास आग पकड़ चुकी थी और पीछे मुड़ी तो नदी में जल बहुत थाl मादा हिरनी क्या करती ? वह प्रसव पीडा सें व्याकुल थीl अब क्या होगा ? क्या हिरनी जीवित बचेगी ? क्या वो अपने शावक को जन्म दे पाएगी ? क्या शावक जीवित रहेगा ? क्या जंगल की आग सब कु्छ जला देगी ? क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पाएगी ? क्या मादा हिरनी भुखे शेर का भोजन बनेगी ? वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है क्या करेगी वो ? वह मादा हिरनी अपने आप को शून्य की स्थिति में छोड़ अपने बच्चे को जन्म देने में लग गईl कुदरत का करिश्मा देखिए.......आसमान ...

पिता का आशीर्वाद

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पिता का आशीर्वाद और उस आशीर्वाद की परीक्षा गुजरात के खंभात के एक व्यापारी की यह सत्य घटना है। जब मृत्यु का समय सन्निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धनपाल को बुलाकर कहा कि बेटा - मेरे पास धन संपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी। बेटे ने सिर झुका कर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रख कर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने प्राण त्याग दिए। अब घर का खर्च बेटे धनपाल को संभालना था।उसने एक छोटी सी ठेलागाड़ी पर अपना व्यापार आरंभ किया। धीरे-धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा। अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है क्योंकि उन्होंने जीवन में दु:ख उठाया पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी इसलिए उनकी वाणी में बल था, उनका आशीर्वाद फलीभूत हुआ और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बार-बार यह बात निकलती...

सुखी रहने का तरीका

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*◆सुखी रहने का तरीका◆* एक बार की बात है संत तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी उनका एक शिष्य, जो स्वाभाव से थोड़ा क्रोधी था उनके समक्ष आया और बोला- गुरूजी, आप कैसे अपना व्यवहार इतना मधुर बनाये रहते हैं, ना आप किसी पे क्रोध करते हैं और ना ही किसी को कुछ भला-बुरा कहते हैं? कृपया अपने इस अच्छे व्यवहार का रहस्य बताइए? संत बोले- मुझे अपने रहस्य के बारे में तो नहीं पता, पर मैं तुम्हारा रहस्य जानता हूँ ! “मेरा रहस्य! वह क्या है गुरु जी?” शिष्य ने आश्चर्य से पूछा। ”तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो!” संत तुकाराम दुखी होते हुए बोले। कोई और कहता तो शिष्य ये बात मजाक में टाल सकता था, पर स्वयं संत तुकाराम के मुख से निकली बात को कोई कैसे काट सकता था? शिष्य उदास हो गया और गुरु का आशीर्वाद ले वहां से चला गया। उस समय से शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल सा गया। वह हर किसी से प्रेम से मिलता और कभी किसी पे क्रोध न करता, अपना ज्यादातर समय ध्यान और पूजा में लगाता। वह उनके पास भी जाता जिससे उसने कभी गलत व्यवहार किया था और उनसे माफ़ी मांगता। देखते-देखते संत की भविष्यवाणी को एक हफ्ते पूरे होने को आये। शिष्य ने...

यह जिंदगी कॉफी की तरह है

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                           "लघुकथा" एक पुराना ग्रुप स्कूल छोड़ने के बहुत दिनों बाद मिला। वे सभी अच्छे कैरियर के साथ खूब पैसे कमा रहे थे। वे अपने सबसे फेवरेट प्रोफेसर के घर जाकर मिले... प्रोफेसर साहब उनके काम के बारे में पूछने लगे। धीरे-धीरे बात लाइफ में बढ़ते " तनाव"और काम के "दबाव" पर आ गई । इस मुद्दे पर सभी एक मत थे कि, भले ही वे अब आर्थिक रूप से बहुत मजबूत हों, पर उनकी जिंदगी में अब वो मजा नहीं रह गया, जो पहले हुआ करता था। प्रोफेसर साहब बड़े ध्यान से उनकी बातें सुन रहे थे........... फिर वे अचानक ही उठे और थोड़ी देर बाद किचन से लौटे और बोले :- "डीयर स्टूडेंट्स, मैं आपके लिए गरमा-गरम  कॉफ़ी बना कर लाया हूंँ, लेकिन प्लीज आप सब किचन में जाकर अपने-अपने लिए कप्स लेते आइए.... लड़के तेजी से रसोई में गए.... वहांँ कई तरह के कप रखे हुए थे, सभी अपने लिए अच्छा से अच्छा कप उठाने में लग गए। किसी ने क्रिस्टल का शानदार कप उठाया तो किसी ने पोर्सिलेन का कप पसं...

जिंदगी की ठक-ठक

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ज़िन्दगी में ठक-ठक तो होते रहेगी... इस खटर-पटर के बीच ही भजन करना होगा...                                     Image from shutterstock एक आदमी घोड़े पर कहीं जा रहा था। घोड़े को जोर की प्यास लगी थी। दूर कुएं पर एक किसान बैलों से "रहट" चलाकर खेतों में पानी लगा रहा था। मुसाफिर कुएं पर आया और घोड़े को "रहट" में से पानी पिलाने लगा। पर जैसे ही घोड़ा झुककर पानी पीने की कोशिश करता, "रहट" की ठक-ठक की आवाज से डर कर पीछे हट जाता। फिर आगे बढ़कर पानी पीने की कोशिश करता और फिर "रहट" की ठक-ठक से डरकर हट जाता। मुसाफिर कुछ क्षण तो यह देखता रहा, फिर उसने किसान से कहा कि थोड़ी देर के लिए अपने बैलों को रोक ले ताकि रहट की ठक-ठक बन्द हो और घोड़ा पानी पी सके। किसान ने कहा कि जैसे ही बैल रूकेंगे कुएँ में से पानी आना बन्द हो जायेगा। इसलिए पानी तो इसे ठक-ठक में ही पीना पड़ेगा। ठीक ऐसे ही यदि हम सोचें कि जीवन की ठक-ठक (हलचल) बन्द हो तभी हम भजन, सन्ध्या, वन्दना आदि करेंगे तो यह हमारी भूल है। हमें भी जीवन की इस ठक-ठक (हलचल) में स...

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माँ और बाबा की कहानी (एक ह्रदयस्पर्शी कहानी)

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  एक  हृदयस्पर्शी  घटना  सुबह सूर्योदय हुआ ही था कि  एक वयोवृद्ध डॉक्टर के दरवाजे पर आकर घंटी बजाने लगा।  सुबह-सुबह कौन आ गया? कहते हुए डॉक्टर की पत्नी ने दरवाजा खोला।  वृद्ध को देखते ही डॉक्टर की पत्नी ने कहा,  दादा आज इतनी सुबह?  क्या परेशानी हो गयी आपको?   वयोवृद्ध ने कहा मेरे अंगूठे के टांके कटवाने आया हूं ,डॉक्टर साहब के पास ।मुझे 8:30 बजे दूसरी जगह पहुंचना होता है, इसलिए जल्दी आया । सॉरी डॉक्टर । डाक्टर के पड़ोस वाले मोहल्ले में ही वयोवृद्ध का निवास था, जब भी जरूरत पड़ती वह डॉक्टर के पास आते थे ।इसलिए डाक्टर उनसे  परिचित था। उसने कमरे से बाहर आकर कहा ,  कोई बात नहीं दादा ।बैठो । बताओ आप का अंगूठा । डॉक्टर ने पूरे ध्यान से अंगूठे के टांके खोले ,और कहा कि   दादा बहुत बढ़िया है। आपका घाव भर गया है ।फिर भी मैं पट्टी लगा देता हूं कि कहीं पर चोंट न पहुंचे । डाक्टर  तो बहुत होते हैं  परंतु  यह डॉक्टर  बहुत  हमदर्दी रखने वाले  आदमी का रखने वाले  और  दयालु थे  डॉक्टर ने प...

भगवान पर भरोसा

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भगवान पर भरोसा एक पुरानी सी इमारत में था वैद्यजी का मकान। पिछले हिस्से में रहते थे और अगले हिस्से में दवाख़ाना खोल रखा था। उनकी पत्नी की आदत थी कि दवाख़ाना खोलने से पहले उस दिन के लिए आवश्यक सामान एक चिठ्ठी में लिख कर दे देती थी। वैद्यजी गद्दी पर बैठकर पहले भगवान का नाम लेते फिर वह चिठ्ठी खोलते। पत्नी ने जो बातें लिखी होतीं, उनके भाव देखते , फिर उनका हिसाब करते। फिर परमात्मा से प्रार्थना करते कि हे भगवान ! मैं केवल तेरे ही आदेश के अनुसार तेरी भक्ति छोड़कर यहाँ दुनियादारी के चक्कर में आ बैठा हूँ।  वैद्यजी कभी अपने मुँह से किसी रोगी से फ़ीस नहीं माँगते थे। कोई देता था, कोई नहीं देता था किन्तु एक बात निश्चित थी कि ज्यों ही उस दिन के आवश्यक सामान ख़रीदने योग्य पैसे पूरे हो जाते थे, उसके बाद वह किसी से भी दवा के पैसे नहीं लेते थे चाहे रोगी कितना ही धनवान क्यों न हो। एक दिन वैद्यजी ने दवाख़ाना खोला। गद्दी पर बैठकर परमात्मा का स्मरण करके पैसे का हिसाब लगाने के लिए आवश्यक सामान वाली चिट्ठी खोली तो वह चिठ्ठी को एकटक देखते ही रह गए। एक बार तो उनका मन भटक गया। उन्हें अपनी आँखों के सामने तारे चमकते...